दादा जी यह घंटी संभाल कर रखना | Hindi Kahani

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गणपत राय नामक एक व्यक्ति बहुत अमीर था। वह बहुत बड़े बंगले में रहता था। उसका कारोबार बहुत अच्छा था। उसे हर प्रकार की सुख सुविधाएं उपलब्ध थी। समाज में उसका स्थान प्रभावशाली होने के कारण उसका हर तरह से सम्मान किया जाता था। यह सब कुछ होते हुए भी उसका मन बड़ा गमगीन सा रहता था। क्योंकि उसके घर में संतान नहीं थी।

और अंदर ही अंदर उसे लगता था कि उसके जाने के बाद यह सारी संपत्ति और ठाठ बाट कौन संभालेगा। कई प्रकार के इलाज और साधु संतों के आशीर्वाद के बाद उसके घर एक सुंदर बच्चे ने जन्म लिया। जिसका गणपत राय ने बड़े लाड प्यार से पालन पोषण किया। उस बच्चे को वह अपने जीवन का सहारा मानने लगा और बड़ा होने पर धीरे-धीरे सारी जायदाद उसको सौंप दी।

समय आने पर बच्चे की शादी भी बड़ी धूमधाम से की गई और गणपत राय प्रफुल्लित खानदानी घराने के सपने देखने लगा। परंतु आने वाली बहू ने उसकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। क्योंकि वह अपने कर्तव्यों को निभाने की बजाए अपने अधिकार प्राप्त करने में चतुर थी। बात-बात पर झगड़ा करना कदम कदम पर बेजती करना उसका स्वभाव बन गया।

उसका पति शाम को जब अपने कारोबार से वापस लौटता तो अपने सास-ससुर के प्रति उसके कान भर कर अपने पति की नींद भी हराम कर देती थी। उसके व्यवहार से गणपत राय बड़ा लाचार हो गया और उसका बेटा भी मजबूर सा रहने लगा। ना चाहते हुए भी वह अपनी पत्नी के चंगुल में फंस गया और अकस्मात ही उन्होंने फैसला लिया।

कि उनके रिहाइशी बंगले के कोने में जो अलग कमरा बना हुआ है वहां पर दोनों बुजुर्ग गणपत राय और उसकी पत्नी रहा करेंगे तथा उनके काम नौकर किया करेंगे। गणपत राय और उसकी धर्मपत्नी को सुबह दोपहर और शाम अलग कमरे में नियमित रूप से खाना भेज दिया जाता था। अगर उनको किसी और चीज की जरूरत पड़ती तो वह भी उनके पास पहुंचा दी जाती थी।

इसके लिए कमरे में एक घंटी रख दी गई। इसको बजाने पर उनकी बात सुनने के लिए आ जाता था। समय बीतता गया गणपत राय के परिवार में पोते ने जन्म लिया। उसका भी बड़े लाड प्यार से पालन पोषण होने लगा। जब उसने कुछ होश संभाले तो उसने पिता से बंगले के कोने में रह रहे गणपत राय और उसकी पत्नी के बारे में पूछा। जो वास्तव में उसके दादा-दादी थे।

उसके पिता ने कहा कि यह मेरे माता-पिता है। यह सुनकर बच्चे ने अपने दादा दादी के पास जाकर उठना बैठना खेलना शुरू कर दिया। लेकिन उसकी मां को ये अच्छा नहीं लगता था। एक दिन शाम को जब उसका पिता अपने कारोबार से वापस आया। तो बच्चे ने कहा – पिताजी आप अपने माता-पिता से मिलने क्यों नहीं जाते ? उनको अलग कमरे में क्यों रखा हुआ है ?

उनको आप अपने साथ इस बड़े घर के अंदर क्यों नहीं रहने देते ? यह बातें जब बच्चे ने पिता से कही तो उस समय बच्चे की मां माथे के ऊपर तेवर बनाकर उसकी बातें सुन रही थी। बच्चे के माता-पिता ने एक दूसरे को भलीभांति देखा और बच्चे की भावना को भी सुना उसकी माता ने तो साफ इंकार कर दिया। कि वह कोने वाले कमरे में नहीं जाएगी जहां उसके साथ ससुर रहते हैं।

पिता को किसी तरह बच्चे ने मना लिया कि वह बुजुर्ग माता-पिता के पास उसके साथ जाए। और यदि संभव हो तो उनको बंगले के अंदर कोई अच्छा सा कमरा दे दे। बच्चा अपने पिता को साथ लेकर दादा-दादी के पास क्या थोड़ी देर बैठने के बाद पिता को वहीं रहने के लिए कहा। और खुद दौड़ा-दौड़ा अपनी मम्मी के पास आया।

बच्चा मम्मी को कहने लगा मम्मी आप भी उस कमरे में चलो जहां दादा दादी जी बैठे हुए हैं। अगर आप मेरे साथ नहीं चलोगे तो मैं वहां जाकर फिर कभी इधर आपके पास नहीं आऊंगा। बच्चे की जिद को देखकर बेदिली से उसकी मम्मी उस कमरे में चली गई जहां उसके सास-ससुर बैठे हुए थे। वहां पहुंचते ही बच्चा अपने दादा और दादी जी के साथ घुल मिलकर खेलने लगा।

और अपने मम्मी पापा से कहने लगा आप मेरे दादा दादी को घर के अंदर ले चलो। उसके मम्मी पापा काफी समय तक चुप रहे जब उनसे कोई उत्तर नहीं मिला तो बच्चे ने वही पड़ी हुई घंटी को अपने हाथ में लेकर अपने दादा दादी जी से कहा। देखो आप इस घंटी को कहीं घूमना कर देना।

इसको संभाल कर रखना क्योंकि जब मेरे मम्मी डैडी बुजुर्ग होंगे और मैं इनको इस कमरे में भेजूंगा तो यह घंटी इनके काम आएगी। बच्चे की यह बात सुनकर ना केवल दादा-दादी हैरान हुए बल्कि बच्चे के माता-पिता के पैरों के नीचे से जमीन निकल गई। कि बच्चे ने यह क्या कह दिया। इससे उनका आने वाला दर्दनाक समय उनकी आंखों के सामने से गुजरने लगा।

अपनी गलती का उन्होंने बहुत पश्चाताप किया और बच्चे के हाथ से घंटी लेकर बोले। कि क्या तो बड़ा होकर हमें इस तरह से अलग कमरे में रखेगा। हम तो इस घंटी को अभी बाहर फेंकने लगे हैं। तुम अपने दादा दादी को लेकर अंदर चलो जो कमरा तुम उचित समझते हो या इनको ठीक लगता है ये उसे ले लें। हम इनका पूरा सत्कार करेंगे। इनकी आज्ञा का पालन करेंगे।

तुमने हमारे आंखों की पट्टी हटा दी है। कि अगर हम अपने माता-पिता के साथ ऐसा व्यवहार करेंगे तो कल तुम भी हमें ऐसी ही दशा में धकेल सकते हो। इस भय के कारण उन्होंने सभी बातें स्वीकार की और आगे के लिए माता-पिता की वैसे ही पूर्ण रूप में सेवा की जैसे आम तौर पर इंसान अपने साथ सलूक करवाना चाहता है।

उनको यथार्थ रूप में स्पष्ट हो गया कि अगर हम अपने इस नन्हे बच्चे की मौजूदगी में अपने बुजुर्गों का सत्कार नहीं करेंगे। उनको किसी प्रकार की कोई परेशानी देंगे। तो बच्चा उससे भी बुरा व्यवहार हमारे साथ कर सकता है। इसलिए भलाई इसी में है कि हम अपने उज्जवल भविष्य के लिए बुजुर्गों के साथ ऐसा व्यवहार करें कि कल को हमारे बच्चे भी हमें सत्कार दे पाए।

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