What Is Octave ? सप्तक (Saptak) क्या है ?

What Is Octave ? सप्तक (Saptak) क्या है  ?

नमस्ते दोस्तों, आज इस आर्टिकल में आप पढ़ेंगे कि सप्तक (Saptak) यानि Octave क्या है ? सप्तक कितने प्रकार के होते हैं. सप्तक के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करने के लिए पुरे आर्टिकल को ध्यान से पढ़ें.

What Is Octave ? सप्तक (Saptak) क्या है ?

भारतीय संगीत में सप्तक से भाव सात स्वरों के क्रमिक समूह से है. पाश्चात्य संगीत विद्वान सप्तक की बजाय Octave शब्द का प्रयोग करते हैं. Octave आठ स्वरों का सूचक है. मध्य सप्तक के ‘सा’ से लेकर तार सप्तक के ‘सां’ तक एक सप्तक (Saptak) मानते हैं.

दुसरे शब्दों में सा, रे, गा, मा, पा, धा, नि, सां, आठ शब्दों के क्रमिक समूह को Octave कहते हैं. यहाँ पर विचार योग्य बात यह है कि भारतीय स्वर सप्तक में सा, रे, गा, मा, पा, धा, नि, शुद्ध स्वरों के अतिरिक्त पांच विकृत स्वर रे, गा, मा’, धा, नि, भी हैं.

इस प्रकार 7 शुद्ध, 5 विकृत, 12 स्वर, एक सप्तक संगीत प्रणाली का मूल अधार है. संगीत का विकास चाहे पाश्चात्य हो मगर यह स्वर सप्तक पर ही आधारित है. गायन के आरम्भ में पहले केवल तीन स्वर ही होते थे. उनको आर्थिक, गायिक और सामिक कहा जाता था. बाद में स्वर संवाद के आधार पर सप्तक पूरा हुआ.

इन स्वरों को षड्ज, ऋषभ, गंधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद कहा जाता है. संक्षेप में इनको सा, रे, गा, मा, पा, धा, नि, कहा जाता है. ‘सा’ से लेकर ‘नि’ तक एक सप्तक बनता है. दूसरा सप्तक फिर षड्ज से शुरू होता है. इस प्रकार कईं सप्तक बन सकते हैं.

अंतर केवल आवाज़ की ऊंचाई-निंचाई का रहेगा. बाद में ऊंचाई-निंचाई के आधार पर मुख्य तिन सप्तक माने गये हैं.

निचे, मध्य और ऊँचे इन तीन स्थानों में एक एक सप्तक माना गया है. उनको मन्द्र, मध्य और तार सप्तक कहा जाता है. सप्तक तो कईं ओर भी हो सकते हैं, परन्तु संगीत में इन तीन मुख्य सप्तकों (Octave) का ही प्रयोग किया जाता है विशेष रूप से गायन में. क्यूंकि गायन में स्वरों का उच्चारण कंठ यानि गले से होता है.

तो हम आशा करते हैं कि आपको समझ आया होगा कि Octave क्या है यानि सप्तक (Saptak) क्या है. नाद की ऊंचाई-निंचाई के आधार पर तीन मुख्य सप्तक माने ये हैं जो इस प्रकार हैं :

सप्तक (Saptak) के कितने प्रकार हैं ?

मन्द्र सप्तक :

मन्द्र सप्तक के स्वरों की आवाज़ मध्य सप्तक के स्वरों की आवाज़ से दुगनी नीची होती है. दुसरे अर्थों में साधारण आवाज़ से दुगनी नीची आवाज़ में जब स्वरों का उच्चारण किया जाता है. इस सप्तक के स्वरों के गायन में हृदय पर जोर पड़ता है.

भारतखंडे स्वरलिपि के अनुसार इन स्वरों को लिखते समय स्वर निचे बिंदी (Dot) लगाई जाती है. जैसे – म. प. ध. नि. आदि.

मध्य सप्तक :

इस सप्तक के स्वरों की आवाज़ न बहुत ऊँची होती है और ना ही नीची होती है. इस सप्तक के स्वरों की आवाज़ मन्द्र सप्तक के स्वरों से दुगनी ऊँची होती है. मध्य सप्तक का प्रयोग खूब किया जाता है. ज्यादातर कलाकार इसी सप्तक से गाना पसंद करते हैं. इस सप्तक के स्वरों के लिए कोई चिन्ह प्रयोग नही किया जाता.

तार सप्तक :

इस सप्तक के स्वरों की आवाज़ मन्द्र सप्तक से चौगुनी और मध्य सप्तक से दुगनी ऊँची होती है. इस सप्तक के स्वरों का उच्चारण करते समय तालू पर काफी जोर दता है. भारतखंडे स्वलिपि पद्धति में इन स्वरों को लिखते समय स्वर के उपर बिंदी (Dot) चिन्ह लगाया जाता हैं. जैसे- सां, रें आदि.

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